याद आता है
वो मंजर
जब हम किसी नदिया किनारे
या अमरइयो में मिलते थे
वो ......लताओं को अपने ऊपर
...
लपेटे हुए निश्छल मुस्कान
को अपने अधरों पे लिए हुए
मंद -मंद -मुस्कुराती हुई
हमसे कहती थी .............................. .............................. ...
कभी अपने सुकोमल हाथों
माला मेरे गले में पहना कर
अपने सिर को मेरे सीने
में चुपाकर मदहोश-बदहवाश सी
धीरे से कहती थी .............................. .............................. ...
तितिलियों सी उड़ती हुई
कभी इन बहारो में कभी उन फूलों के बीच
कभी वहाँ उन पेड़ो के पीछे छिपकर
कभी उन पत्तों बीच अपने को छुपाकर
मुझे बुलाकर कहती थी............................ .........................
.
चंचल हिरणी सी कहीं उन पहाड़ो पर
कभी वहाँ ...उन पहाड़ों की चोटियों पर
खड़ी दोनों बाहों को फैलाकर
जोर-जोर से चिल्ला कर
कहती थी............................ .............................. .............
वहाँ उन झरनों के नीचे
खड़ी होकर भीग जाती
फिर अपनी गीले गेसुओं से
मोतियों जैसी पानी की बूंदे निचोड़ते हुए
हमसे कहती थी .............................. .............................. .....
यहाँ इस चट्टान से
वहा उन मौजो के बीच कूद जाती
इनसे जड़ते हुए उन भंवरों तक पँहुच जाती
अपने को कभी डूबा कर कभी तैरकर
हँस कर ये कहती थी .............................. ..............................
कभी वहां उस पनघट पे
घंटों मेरे इंतजार में रस्सी पकडे खड़ी रहती
बाल्टी का पानी किसी और को देकर
दुबारा पानी निकलती नजरें इन राहों पे होती
मुझे देखते ही झटपट बाल्टी लेकर चल पड़ती
और कहती रस्ते में कहती थी .............................. ...................
टकटकी लगाये उन खिडकियों पे
घंटो मुरझाई बैठी रहती मुझे देखते ही खिल जाती
अपने अधखुले पंखुडियो से होंठ गोल करके
तेज़ी से सीटी-सी-आवाज निकालती और जब मै उधर देखता
अपनी दाईं आँखों को छोटी-छोटी फिर बंद कर लेती
हँसती-मुस्कराती हाथों को हिलाते हुए
कहती थी .............................. .............................. ..............
मुझे अब भी याद आता है .............................. ......................
को अपने अधरों पे लिए हुए
मंद -मंद -मुस्कुराती हुई
हमसे कहती थी ..............................
कभी अपने सुकोमल हाथों
माला मेरे गले में पहना कर
अपने सिर को मेरे सीने
में चुपाकर मदहोश-बदहवाश सी
धीरे से कहती थी ..............................
तितिलियों सी उड़ती हुई
कभी इन बहारो में कभी उन फूलों के बीच
कभी वहाँ उन पेड़ो के पीछे छिपकर
कभी उन पत्तों बीच अपने को छुपाकर
मुझे बुलाकर कहती थी............................
.
चंचल हिरणी सी कहीं उन पहाड़ो पर
कभी वहाँ ...उन पहाड़ों की चोटियों पर
खड़ी दोनों बाहों को फैलाकर
जोर-जोर से चिल्ला कर
कहती थी............................
वहाँ उन झरनों के नीचे
खड़ी होकर भीग जाती
फिर अपनी गीले गेसुओं से
मोतियों जैसी पानी की बूंदे निचोड़ते हुए
हमसे कहती थी ..............................
यहाँ इस चट्टान से
वहा उन मौजो के बीच कूद जाती
इनसे जड़ते हुए उन भंवरों तक पँहुच जाती
अपने को कभी डूबा कर कभी तैरकर
हँस कर ये कहती थी ..............................
कभी वहां उस पनघट पे
घंटों मेरे इंतजार में रस्सी पकडे खड़ी रहती
बाल्टी का पानी किसी और को देकर
दुबारा पानी निकलती नजरें इन राहों पे होती
मुझे देखते ही झटपट बाल्टी लेकर चल पड़ती
और कहती रस्ते में कहती थी ..............................
टकटकी लगाये उन खिडकियों पे
घंटो मुरझाई बैठी रहती मुझे देखते ही खिल जाती
अपने अधखुले पंखुडियो से होंठ गोल करके
तेज़ी से सीटी-सी-आवाज निकालती और जब मै उधर देखता
अपनी दाईं आँखों को छोटी-छोटी फिर बंद कर लेती
हँसती-मुस्कराती हाथों को हिलाते हुए
कहती थी ..............................
मुझे अब भी याद आता है ..............................
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