Saturday, 11 October 2014

परम पूज्य पिता जी को समर्पित

निर्भय मृदुभाषी अभिमानी
पितृ आप की कुञ्ज-लता

चतुर चकोर लूट ले जाते
देख आप की स-हृदयता

हे निश्छल मन के श्वामी
अनंत चले ये जीव-लता

जीवन पर्यन्त निभाया है
अडिग रहे ये मानवता

माँ पिता जी को समर्पित

आप लोग की उज्जवल आभा का
अंश मात्र हूँ
जब तक सांस चलेगी आप लोगों के आशिर्वचनों
का पात्र हूँ

Wednesday, 16 January 2013

नया जमाना

नए ज़माने में  आ गए हैं अब हम
चाची को भाभी -!भाभी!जान कह बुलाइये


ऑफिश से पहुँच घर चाय गर चाहिए तो
स्वीटू डार्लिंग- स्वीटू डार्लिंग कहते घर में जाइये

देखना हो गर तुम्हे शंकर का ताण्डव-नृत्य
बीबी के मायके को बुरा कह जाइये

गर्लफ्रेंड का मुखड़ा !चंदा  सामान बोल
भगवान्  सा न्योछावर ले आइये

परमोसन  गर नहीं हो पा रहा है तो
बॉस की बीबी को गिफ्ट भेजवाइये

मंत्री पद-पर-आशीन होना चाहते हो
ज्यादा झूठ थोडा सच का शरबत बनाइये

भूख-प्यास से बेहाल लोग बीच जा
गाँधी जी बन  वही  सरबत पिलाइये .........

Saturday, 3 November 2012

ऐ चाँद जरा जल्दी आना

ऐ  चाँद जरा जल्दी आना

ऐ  चाँद जरा जल्दी आना
तू रोज फ़िरा  करता बन-उपबन
नहीं गिला-सिकवा करता मन
तू  दूर  देश को  ना  जाना
ऐ  चाँद जरा .........................................
ऐ  चाँद जरा ..........................................
रीत-प्रीत घनघोर-घटाएँ
जुल्फे बादल तुझे बुलाएँ
इन तरसी आँखों को न तरसाना 
चाँद जरा जल्दी ..................................
ऐ  चाँद जरा ........................... ............
हर नजर उठ रही है तुझपर
बिजली सी गिरती है मुझपर
दर्दे दिल को न तड्पाना
चाँद जरा जल्दी ..................................
ऐ  चाँद जरा ........................... ............
रोते बच्चे चुप हो जाते
चंदा मामा तुझे बुलाते
सपनो में उनके आ जाना
चाँद जरा जल्दी ..................................
ऐ  चाँद जरा ........................... ...........
 शैल  धरा प्याशी  तेरे बिन
नहीं गुजरता है अब पल-दिन
"राज"जरा अपना बतलाना
चाँद जरा जल्दी ..................................
ऐ  चाँद जरा ........................... ...........

Tuesday, 9 October 2012

दो बूँद शराब की.........

दो बूँद शराब की हमें निकाल ली
बेशर्मों को क्या  कहें आदत बिगाड़ दी
दो बूँद शराब......................................................

होटों से लगाते ही वो अक्श उभर आता  है
जिस शक्श की तस्वीर को दिल से निकाल दी 
दो बूँद शराब......................................................

मदहोशी में क्या कुछ कर गुजरता हूँ कह नहीं सकता
कुछ घूँट पैमानों ने  मेरी दुनिया उजाड़ दी
दो बूँद शराब......................................................

आशिकी

आशिकी फिर भी कहती है हमें भी साथ रहने दो
दीवानों के दिलों में हो या आशिकों की निगाहों में........

Friday, 5 October 2012

ग़ज़ल


कभी मगरूर-ए-करम का खुद पर रहम देखा ,
कभी समंदर पे दरिया का शहर देखा ...........

चाह कर भी न मिल पाया उससे मैं कभी
रात ख्वाबों में जिसे हर नजर देखा .....................

बेचैनियों का सबब है कटता क्यों नहीं
बात कुछ भी ना कर सका जो आज दोपहर देखा .............

मजलिस-ए-आशिकों की हमनें रूहानी कर दी
सब्ज-फूलों-की हँसी चादरों पे जो भरम देखा ...............

हसरतें थी उनसे बस दो नजर होने की
फैशले रोज करते रहे आज उन्हें करते देखा .........

लाखों की भीड़ मई उन्हें पहचान हम गये
घने गेशुओं को रुखसार से हटाते जो उधर देखा ......

अक्श उनके जो उभरे अब क्या छुपाये "राज"
गैरत-ए-हुस्न पर होते जो बेरहम देखा ...............